Friday, June 27, 2008

SAHIR LUDHIANVI

--------GHAM-----
tum ap’naa ranj o Gham ap’nii pareshaanii mujhe de do
tumhe Gham kii qasam is dil kii viiraanii mujhe de do

ye maanaa maiN kisii qaabil nahiiN huuN in nigaahoN meN
buraa kyaa hai agar ye dukh ye hairaanii mujhe de do

maiN dekhuuN to sahii duniyaa tumheN kaise sataatii hai
koii din ke liye apanii nigah’baanii mujhe de do

vo dil jo maiNne maaNgaa thaa magar GhairoN ne paayaa
baRii kaif hai agar usakii pashemaanii mujhe de do



Thursday, June 19, 2008

मिर्जा ग़ालिब ग़ज़ल

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हजारो ख्वाहिशे ऎसी की हर ख्वाइश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यू न मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यू न दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए है न लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भरम खुल जाए जालिम तेरे कामत की दराजी का
अगर इस तुर्रा-ऐ-पुरपेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले

मगर लिखवाये कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रक्खर कलम निकले

हुई इस दौर में.न माँ.न्सुउब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना जो जहा.न से जाम-ऐ-जम निकले

हुई जिनसे तवक्को खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी जियादा खस्ता-ऐ-तेग-ऐ-सितम निकले

मुहब्बत में.न नही.न है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते है.न जिस काफिर पे दम निकले

ज़रा कर जोर सीने पर की तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के वास्ते परदा न काबे से उठा जालिम
कही.न ऐसा न हो या.न भी वही काफिर सनम निकले

कहा.न मैखाने का दरवाजा 'घलिब' और कहा.न वाइज़
पर इतना जानते है.न कल वो जाता था के हम निकले

Tuesday, June 17, 2008

ग़ालिब शेयर

शाम होते ही चिरागों को बुझा देता हूँ
यह दिल ही काफ़ी है तेरी याद मैं जलने के लिए


नक्श फरियादी है किसकी शोखी-ऐ-तहरीर का
काघज़ी है पैरहन हर पैकर-ऐ-तस्वीर का


कावे-कावे सख्त_जानी हाय तन्हाई न पूछ
सुबह करना शाम का लाना है जू-ऐ-शीर का

दिल-ऐ-नादाँ तुझे हुआ क्या है ?
आख़िर इस दर्द की दावा क्या है


हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

जब की तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा, 'इ खुदा ! क्या है



हमने कितनी कोशिश की उन्हें मानाने की,
न जाना कहा से सीख ली उन्होंने
यह अदा जिद्द पर उतर जाने की
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Sunday, June 15, 2008

ख़ूबसूरत

-----ख़ूबसूरत
ख़ूबसूरत हैं वो लब
जो प्यारी बातें करते हैं

ख़ूबसूरत है वो मुस्कराहट
जो दूसरों के चेहरों पर भी मुस्कान सजा दे

ख़ूबसूरत है वो दिल
जो किसी के दर्द को समझे
जो किसी के दर्द में तडपे

ख़ूबसूरत हैं वो जज्बात
जो किसी का एहसास करें

ख़ूबसूरत है वो एहसास
जो किसी के दर्द के में दावा बने

ख़ूबसूरत हैं वो बातें
जो किसी का दिल न दुखाएं

ख़ूबसूरत हैं वो आंखें
जिन में पकेजगी हो
शर्म ओ हया हो

ख़ूबसूरत हैं वो आंसू
जो किसी के दर्द को
महसूस करके बह जाए

ख़ूबसूरत हैं वो हाथ
जो किसी को मुश्किल
वक़त में थम लें

ख़ूबसूरत हैं वो कदम
जो किसी की मदद के लिए
आगे बढें !!!!!

ख़ूबसूरत है वो सोच
जो किसी के लिए अच सोचे

ख़ूबसूरत है वो इन्सान
जिस को खुदा ने ये
खूबसूरती अदा की.

Saturday, June 14, 2008

ae masoom si bholi bhali ladki

-----Ae Masoom Si Bholi Bhali Ladki------
Kisi Se Tum Dil Na Lagana
Kisi Ko Aitbar o Bharosa Ka Rishta
Kabhi Na Dena
Ess Shaher Ke Logoon Ki Fitrat
Mosam Ki Si Hai
Jald Badal Jaty Hain
Dil Toor Jaty Hain
Hai Dil Kanch Ki Manind
Jo Ho Jaye Ager Tukre Tukre
To Judd Nahi Sakta
Ess Kanch Ke Tukre Ko Tum
Abhi Se Sanbhal Ke Rakhna
Na Kisi Per Aitabaar Kerna
Ae Masoom Si Ladki..........