नाम लिया जब तेरा किसी ने,
लम्हों का फिर ख्याल सा आया हमें
जब साथ मिलकर, करते थे घंटों बातें
आज आवाज सुनने को मन तरसता है,
हंसी सजाने का वादा किया था,
आज क्यों तुमने फिर रूलाया हमें,
यादों के सहारे हम तो काट लेते,
जीवन का हर पल खुशी के साथ,
मेरी आंखों में बसे उन सपनों से,
आज फिर तुमने क्यों उठाया हमें,
Sunday, September 7, 2008
ख्याल
Tuesday, September 2, 2008
उम्मीद
आसमान पर साथ तारों का,
अपना सा लगा चांद भी,
चमकी सुनहरी धूप सुबह तो,
सूरज को पाया साथ भी,
छाए काले मेघा तो,
बारिश के साथ झूमे मन,
हरे-हरे पत्तों को देख,
मन चाहे रख लू,
मुट्टी में बंद करके,
अचानक छाने लगा चारों,
तरफ वो गहरा अंधेरा,
फिर न दिखा चांद,
सूरज भी नहीं आया नजर,
बारिश को बूंदों को तरसे,
चहकना भी हुआ बंद,
साथ थी तो वो खाली मुट्ठी,
बंद कर रखी थी ऐसे,
छूट न जाए कुछ मुझ से,
वो लम्हें, जिनको देखा,
मेरी इन आंखों ने,
जब थे इनमें सजे हुए,
सुंदर से सुनहरी सपने,
उम्मीद जगी फिर एक मन में,
फिर चमकेगा वो प्यारा चंदा,
निकलेगा जब सूरज तो,
सुनाई देगी वो मीठी बोली,
फिर बदलेगा मौसम तो,
पेड़ों पर आएंगे पत्ते,
बागों में आएगी बाहर,
बरसेंगे मेघा फिर से,
अपना सा लगा चांद भी,
चमकी सुनहरी धूप सुबह तो,
सूरज को पाया साथ भी,
छाए काले मेघा तो,
बारिश के साथ झूमे मन,
हरे-हरे पत्तों को देख,
मन चाहे रख लू,
मुट्टी में बंद करके,
अचानक छाने लगा चारों,
तरफ वो गहरा अंधेरा,
फिर न दिखा चांद,
सूरज भी नहीं आया नजर,
बारिश को बूंदों को तरसे,
चहकना भी हुआ बंद,
साथ थी तो वो खाली मुट्ठी,
बंद कर रखी थी ऐसे,
छूट न जाए कुछ मुझ से,
वो लम्हें, जिनको देखा,
मेरी इन आंखों ने,
जब थे इनमें सजे हुए,
सुंदर से सुनहरी सपने,
उम्मीद जगी फिर एक मन में,
फिर चमकेगा वो प्यारा चंदा,
निकलेगा जब सूरज तो,
सुनाई देगी वो मीठी बोली,
फिर बदलेगा मौसम तो,
पेड़ों पर आएंगे पत्ते,
बागों में आएगी बाहर,
बरसेंगे मेघा फिर से,
Thursday, August 28, 2008
चीर हरण

नजर में आई वो सुर्खियां,
लूटी फिर नारी का अस्मत,
फिर सवालों के घेरे में आई,
क्या हुआ, कैसे हुआ चीर हरण,
महाभारत में तो कौरवों की चाल,
तब हारें पांडव,
फिर हुआ था चीरहरण,
तब हारें पांडव,
फिर हुआ था चीरहरण,
आज तो रोजाना दोहराया जाता,
इतिहास भरी सभा का ऐसे,
काले कोट में तो, कभी खाकी वर्दी में,
शब्दों से बार-बार, बेइज्जत होती नारी,
चुप्पी को बना लेती है हथियार,
मुंह खोले तो इज्जत होती तार-तार
लुट कर भी वह बनती गुनाहगार,
माथे पर लगता बदचलन का दाग,
Tuesday, August 26, 2008
नारी

कभी नजर में बनती बेचारी,
दिखती है बस उसकी लाचारी,
खुद को ताकतवर हो मानते,
फिर क्यों नहीं इतना जानते,
बिना न जग में जीवन नारी,
सबकी है वो पालन हारी,
मां बन कर कांटे को चुनती,
पत्नी बन कर तानों को बुनती,
पुरूष बन कर तुम करते मान.
आता नहीं कभी उसका ध्यान,
वक्त के साथ सबकुछ है बदला,
दिखती है बस उसकी लाचारी,
खुद को ताकतवर हो मानते,
फिर क्यों नहीं इतना जानते,
बिना न जग में जीवन नारी,
सबकी है वो पालन हारी,
मां बन कर कांटे को चुनती,
पत्नी बन कर तानों को बुनती,
पुरूष बन कर तुम करते मान.
आता नहीं कभी उसका ध्यान,
वक्त के साथ सबकुछ है बदला,
लोगों ने अब इतिहास भी बदला,
पर नहीं बदली तो सोच हमारी,
आज की भी नारी बन गई बेचारी,
पर नहीं बदली तो सोच हमारी,
आज की भी नारी बन गई बेचारी,
टूटा फिर एक तारा
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