Tuesday, September 2, 2008

उम्मीद

आसमान पर साथ तारों का,
अपना सा लगा चांद भी,
चमकी सुनहरी धूप सुबह तो,
सूरज को पाया साथ भी,
छाए काले मेघा तो,
बारिश के साथ झूमे मन,
हरे-हरे पत्तों को देख,
मन चाहे रख लू,
मुट्टी में बंद करके,
अचानक छाने लगा चारों,
तरफ वो गहरा अंधेरा,
फिर न दिखा चांद,
सूरज भी नहीं आया नजर,
बारिश को बूंदों को तरसे,
चहकना भी हुआ बंद,
साथ थी तो वो खाली मुट्ठी,
बंद कर रखी थी ऐसे,
छूट न जाए कुछ मुझ से,
वो लम्हें, जिनको देखा,
मेरी इन आंखों ने,
जब थे इनमें सजे हुए,
सुंदर से सुनहरी सपने,
उम्मीद जगी फिर एक मन में,
फिर चमकेगा वो प्यारा चंदा,
निकलेगा जब सूरज तो,
सुनाई देगी वो मीठी बोली,
फिर बदलेगा मौसम तो,
पेड़ों पर आएंगे पत्ते,
बागों में आएगी बाहर,
बरसेंगे मेघा फिर से,

Thursday, August 28, 2008

चीर हरण





नजर में आई वो सुर्खियां,
लूटी फिर नारी का अस्मत,
फिर सवालों के घेरे में आई,
क्या हुआ, कैसे हुआ चीर हरण,
महाभारत में तो कौरवों की चाल,
तब हारें पांडव,
फिर हुआ था चीरहरण,
आज तो रोजाना दोहराया जाता,
इतिहास भरी सभा का ऐसे,
काले कोट में तो, कभी खाकी वर्दी में,
शब्दों से बार-बार, बेइज्जत होती नारी,
चुप्पी को बना लेती है हथियार,
मुंह खोले तो इज्जत होती तार-तार
लुट कर भी वह बनती गुनाहगार,
माथे पर लगता बदचलन का दाग,

Tuesday, August 26, 2008

नारी


कभी नजर में बनती बेचारी,
दिखती है बस उसकी लाचारी,
खुद को ताकतवर हो मानते,
फिर क्यों नहीं इतना जानते,
बिना न जग में जीवन नारी,
सबकी है वो पालन हारी,
मां बन कर कांटे को चुनती,
पत्नी बन कर तानों को बुनती,
पुरूष बन कर तुम करते मान.
आता नहीं कभी उसका ध्यान,
वक्त के साथ सबकुछ है बदला,
लोगों ने अब इतिहास भी बदला,
पर नहीं बदली तो सोच हमारी,
आज की भी नारी बन गई बेचारी,

टूटा फिर एक तारा


  • आसमान से टूटा फिर एक तारा,

  • मांगी दुआ तो किसी ने दित्कारा,

  • क्या जाने कोई उस तारे का दर्द,

  • कभी रोए खुद पर तो कभी उनपर,

  • जो चमकता देख तो होते है खुश,

  • टूट जाने पर भी मांगते है दुआ,

  • अंजान है उसके बिछड़ने के गम से,

  • बिछड़ कर चला गया कितनी दूर,

  • जो अब वापिस न लौटेगा कभी,

  • फिर चमकने को आसमान में,

Tuesday, August 19, 2008

कुदरत


वो वादियां, वो चारों तरफ की हरियाली,

सुनहरी किरणों की आसमान पर छाई लाली,

कभी आसमान से टपकता पानी,

झरनों की वो सुंदर कहानी,

पंछियों के चहकने का नजारा,

देख लगता सबकुछ कितना प्यारा,

जमकर बरसे मेघा तो मस्ती सी छाई,

सतरंगी पींघ भी आसमान पर नजर आई,

पेड़ों के हरे पत्तों पर टपकती बूंद ऐसे,

नहा कर निकली हो वो पानी से जैसे,